Sunday, 18 September 2011


अन्ना &कम्पनी व्यवस्था परिवर्तन की बात नहीं करती ! क्यों ? - शंकर दत्त फुलारा

आज से एक साल पहले तक हमें नहीं पता था ! कि जन लोकपाल बिल क्या है ? एक साल
भी पूरा नहीं; कुछ ही महीने कहो। हम केवल इतना जानते थे कोई अन्ना हजारे हैं जो
महाराष्ट्र में समाज सेवी हैं। और सरकार से टकराते रहते हैं।अन्ना(& कंपनी) में
से एकाध को सीरियल के कारण या सूचना के अधिकार के कारण केवल नाम से जानते
थे।बाकियों का तो कभी नाम भी नहीं सुना था।
हमें पता लगा ; बाबा रामदेव जंतर-मंतर दिल्ली में भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक
प्रदर्शन कर रहे हैं, अचानक पता लगा कि इसमें “अन्ना हजारे (& कंपनी)” भी भाग
लेंगे। ये दो-तीन नाम ऐसे थे जिन पर देश के लोगों को विश्वास था, इससे बड़ी
ख़ुशी हुयी। तभी हमें पता लगा कि जन लोकपाल बिल क्या है । आपके “अप्रेल के
अनशन” में “भारत स्वाभिमान” के कार्यकर्ताओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया क्योंकि
इन्हें बाबा रामदेव पिछले पांच साल से अपने योग शिविरों के माध्यम से देशभक्ति
का पाठ पढ़ा रहे थे और व्यवस्था परिवर्तन के आन्दोलन की जड़ें मजबूत कर रहे थे;
जिससे नई आजादी आसानी से मिल सके। लेकिन ! जब आपके तेवर वहां बदल गए; और भारत
स्वाभिमान के कार्यकर्ताओं को कोई महत्त्व नहीं दिया गया, उससे भी बड़ी बात;
अनशन तोड़ने के बाद जो नए नाम जनता को और सुनाई दिए ! तो माथा ठनका ! और दाल
में काला नजर आने लगा ।
हम भारत स्वाभिमान वालों का आन्दोलन है; सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का। जिसमे
अंग्रेजों के द्वारा “सशर्त” दी गयी आजादी, उनके द्वारा लागू 34735 कानून, उनके
द्वारा लागू शैक्षिक कोर्स और व्यवस्था,उनकी बनायीं न्याय और कानून
व्यवस्था,उनका बनाया तंत्र, और भी जो कुछ उन्होंने भारतीयों का “स्वाभिमान”
समाप्त करने के लिए किया था; वह सब बदलना। अन्ना ! (&कंपनी) आपने शायद न देखा
हो; हम तो 2003 से बाबा रामदेव जी को आस्था चैनल पर देख रहे हैं और जब से “भारत
स्वाभिमान ट्रस्ट” बना है उसके सदस्य भी हैं। देश के जो लोग संस्कार हीन हो गए
थे उनके संस्कार जगाने का काम बाबा जी ने किया है; लोग अस्वस्थ रहने के और दवा-
दारू के आदि हो चुके थे उन्हें स्वास्थ्य का महत्त्व बाबा जी ने ही बताया और
स्वस्थ रहने का तरीका बताया। और सबसे बड़ी बात ये बताई और अहसास कराया कि आजादी
के 60 वर्षों के बाद भी भारत गुलामी से उबरा नहीं है;अपितु और बुरी स्थिति में
है। उन्होंने ही बताया कि “भारत के भ्रष्टों का 300 लाख करोड़” रुपया विदेशी
बैंकों में जमा है। 100 लाख करोड़ तो यहीं भारत में ही जमा है। बाबा जी ने ही
समझाया है कि ये इतना रुपया है कि एक-एक गाँव को 100 करोड़ रुपया मिल सकता है ।
उन्होंने ही बड़े नोट( करेंसी) बंद करने की मांग की, और इसके लिए लोगों को
समझाया। स्वदेशी का महत्त्व और विदेशी की लूट उन्होंने ही समझाई। समझाई ही नहीं
अपितु विदेशी कम्पनियों से मुकाबले के लिए स्वदेशी सामान भी उपलब्ध कराया ।
आयुर्वेद का महत्त्व तो दुनिया भूल ही चुकी थी उसे भी बाबा जी और बालकृष्ण जी
ने ही प्रतिष्ठापित किया और अन्ना (&कंपनी) ! जन लोकपाल बिल को भी बाबा ने अपने
मुद्दों में शामिल किया, ये जानते हुए भी; कि “इस व्यवस्था में कोई भी कानून बन
जाये सफल नहीं होगा”। केवल इसलिए; कि आन्दोलन दो दिशाओं में न भटके, जैसा कि
सरकार चाहती थी।
पर बड़ा आश्चर्य है अन्ना(&कंपनी) ! आपने एक बार भी व्यवस्था परिवर्तन की बात
नहीं की। कभी विदेशी कम्पनियों के विरोध की बात नहीं की,कभी भी विदेशों में जमा
धन की बात नहीं की, कभी भी कु व्यवस्थाओं की बात नहीं की, कु संस्कारों की बात
नहीं की; क्यों ? इससे हमारे मन में भ्रम पैदा हो रहा है। कि ये उसी तरह तो
नहीं हो रहा जैसे क्रान्तिकारियो के साथ कांग्रेस(अंग्रेजों की मिलीभगत से) ने
किया। नहीं-नहीं अन्ना (&कम्पनी) तुम गलत नहीं हो सकते । इतने बड़े व्यवस्था
परिवर्तन के आन्दोलन को ‘केवल एक जन लोकपाल बिल “कानून मात्र” के लिए’ भटकाने
का कलंक आपने माथे नहीं ले सकते। तुम उन शक्तियों के हाथों में मोहरे नहीं बन
सकते जो भारत का स्वाभिमान जागना नहीं देख सकते। तुम विदेशी कम्पनियों के
षड्यंत्रों में शामिल नहीं हो सकते। तुम सरकार(भ्रष्टों) की इच्छा पूर्ति नहीं
कर सकते ?अन्ना (&कंपनी) तुम आज के भ्रष्ट मीडिया का मोहरा नहीं बन सकते; जिन
पर विदेशी कम्पनियों और पाश्चात्य मानसिकता के लोगों का कब्ज़ा है।
पर ; न जाने क्यों ? विश्वास नहीं होता । न तुम्हारे विचार ही हमने ऐसे सुने, न
कोई गतिविधि हमने ऐसी देखी कि आपने कभी “नई आजादी नई व्यवस्था” का जो आन्दोलन
बाबा रामदेव ने चलाया है उसका समर्थन किया हो। शायद ही आप में से किसी ने भी आज
तक आस्था चैनल पर भारत स्वाभिमान का जनजागरण (योग शिविरों को) देखने के लिए
सुबह जल्द उठने की ज़हमत उठाई हो ।
लेकिन क्या करें ? आप और कोई भी स्वतन्त्र है कुछ भी करने को । सही का पता तो
तभी चल जाता है ; लेकिन गलती का आंकलन पचास साल बाद होता है । जैसे आजादी के
पचास साल बाद हुआ। तब भी जनता की जागरूकता को भ्रामक आजादी की ओर मोड़ दिया गया
था और व्यवस्था कुछ लोगों ने अपने और खानदानो के राज करने के लिए बनवा ली थी ।




अन्ना के साथ चलना , नहीं चलने से बेहतर है ....


अन्ना के साथ चलना , नहीं चलने से बेहतर है ....



अन्ना की आंधी ने स्वतंत्रता संग्राम के बाद पहली बार अनगिनत रिकोर्ड बनाते हुए युवाओं के जोशोखरोश को एक निश्चित दिशा दी है . जैसे पूरा देश एक नींद से जाग उठा है , मुर्दा जिस्मों में हरकतें होने लगी हैं . आजादी के बाद देश में पहली बार सत्ता पक्ष के अलावा पूरा देश एक मुद्दे पर एकजुट नजर आ रहा है . युवा , बाल , वृद्ध , सरकारी संस्थाओं से जुड़े लोंग या व्यापारी , अन्ना की मुहीम में सभी एक साथ कंधे से कन्धा मिला कर खड़े हैं .

स्वतन्त्रता की लडाई एक- दो वर्षों नहीं सदियों के लम्बे संघर्ष की दास्तान है. लडाई जीत कर स्वतन्त्रता का जश्न मनाते लोगों ने तब सोचा नहीं होगा कि यह आंतरिक गुलामी की ओर बढ़ता एक कदम है . माटी के ऊपर सफ़ेद झक वस्त्रों में मंच पर सलामी ले रहे नेताओं और आह्लादित जनसमूह ने धीरे-धीरे उन लोगों को भूलना शुरू कर दिया जिनके शरीर लोकतंत्र की नींव में दबे पड़े थे और जिनकी आत्माएं वही उसी मिट्टी के नीचे दबी पड़ी कराह रही थी . 65 वर्षों में हम अपनी पीढ़ियों को एक ऐसा नेता या अगुवाई करने वाला शख्स नहीं दे सके , जो हमारे युवाओं को देश निर्माण की राह पर चलने को प्रेरित कर सके , फलतः यह युवा शक्ति विभिन्न रक्तरंजित आंदोलनों का हिस्सा बन जाने में जाया होती रही है l सरकारों द्वारा बनाई जाने वाली नीतियाँ और उपरी स्तर पर फैले भ्रष्टाचार के जाल ने आम आदमी को सोचने पर मजबूर कर ही दिया कि क्या यही वास्तविक आज़ादी थी , जिसके लिए हमारी पुरानी पीढ़ी ने अपने लाल यूँ ही गँवा दिए . लोकतंत्र में जनता ही चुनती है सरकार , मगर जिसे भी चुनो , सत्ता की मलाई का स्वाद चखते ही उनकी भाषा बदल जाती है या वे बदलने पर मजबूर होते हैं . ईमानदारी से काम करने या सेवा करने का संकल्प लिए युवा जब राजनीति , लोक सेवा अथवा पुलिस सेवा का दामन थामते हैं तब उनमे अतुल्य साहस और जोश होता है मगर कुछ कदम चलते ही उन्हें लडखडाना पड़ जाता है और अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए वे इस व्यवस्था के कुचक्र का हिस्सा बन जाते हैं .

व्यवस्था के महाजाल में फैले भ्रष्टाचार से सत्य और न्याय का गला घुटता रहा है और आखिर अंतिम साँसें लेते दिखाई पड़ने लगा है . हमारी सरकारी नीतियाँ अमीर को और अमीर तथा गरीब को और गरीब बनाने में ही कामयाब रही हैं . विकिलीक्स के आंकड़े बताते हैं कि किस तरह देश की पूरी पूंजी कुछ लोगों के हाथ में सीमित होती जा रही है जिसके दुष्परिणाम आम मध्यम वर्ग /निम्न वर्ग को भुगतना पड़ रहा है . सुरसा की तरह बढती महंगाई ने आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है . वर्षों तक दबा पड़ा यह गुस्सा आज अन्ना के साथ फूट निकल पड़ने को तैयार है . वर्तमान सरकार इस ज्वालामुखी में दबे लावे को समझ नहीं पाई बल्कि हास्यास्पद तर्क देती रही है कि प्रस्तावित जनलोकपाल बिल सिर्फ एक सिविल सोसाईटी की मांग है . उमड़े जन सैलाब और अन्ना के प्रति श्रद्धा और दीवानगी देखकर भी कोई ना समझना चाहे तो उसे क्या कहा जाए .

वास्तव में इस तरह का कोई बिल भ्रष्टाचार से त्रस्त आम आदमी की मांग है . यह मध्यमवर्गीय जन की पीड़ा है क्योंकि सबसे ज्यादा भुगतना उसे ही पड़ रहा है. भीतर दबे उनके गुस्से की चिंगारी को अन्ना नाम की आंधी ने दावानल बनाने में मदद की . कहीं न कही बाबा रामदेव के साथ दुर्व्यवहार , अन्ना की गिरफ़्तारी और सत्ता पक्ष के अनर्गल बयानों ने भी आमजन की निर्लिप्तता को दूर किया और उन्हें सड़क पर आ खड़े होने को विवश किया . अब जनता इतनी भोली भी नहीं रही कि वह खुली आँखों से भी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले को ही भ्रष्टाचारी साबित करने की कोशिशों को समझ नहीं सके और अब तो वह कह भी चुकी है की बस , अब और नहीं !

लोग कहते हैं जनता चुनती है सरकार ,मगर ये नहीं देखते की जिसे भी चुना जाता है , वह इरादतन या मजबूरन इस व्यवस्था का अंग बन जाने को मजबूर हो जाता है इसलिए इस लोकपाल बिल के साथ ही अपने भावी कार्यक्रमों में भ्रष्ट चरित्रों के लिए नापसंदगी का प्रावधान रखने अथवा चुने जाने के बाद भी वापस बुला लेने जैसे सुझावों ने आम जनता को सिविल सोसाईटी के उद्देश्यों से खुद को जोड़ने और उनमे आस्था रखने में मदद की है .

मैग्सेसे पुर्सस्कार से सम्मानित अन्ना की टीम के डॉ महत्वपूर्ण साथी अरविन्द केजरीवाल आयकर विभाग से तो किरण बेदी पुलिस के उच्च अधिकारी रहे हैं और कही न कही प्रताड़ित भी रहे हैं, जबकि शांति भूषन और प्रशांत भूषन नामी गिरामी वकील हैं इसलिए यह टीम व्यवस्था की खामियों और दुष्प्रभाव से अच्छी तरह वाकिफ है .


जन लोकपाल बिल पर छेड़ा गया आन्दोलन हालाँकि उस तरह नहीं पास हुआ , जैसी इसकी कल्पना की गयी थी , मगर फिर भी भ्रष्टाचार मुक्त देश की सकारत्मक दिशा की ओर बढ़ते एक कदम के रूप में यह समय यादगार बन गया है । वास्तव में सही यही है कि सिर्फ कोई भी कानून इस देश को सुन्दर भविष्य नहीं दे सकता , जब तक देश के नागरिक इसे सुन्दर बनाने की ठोस पहल ना करें । कानून सिर्फ एक माध्यम है , जबकि कार्य नागरिकों द्वारा किया जाना है ,वह है -संकल्प लेना और निभाना कि हम रिश्वत नहीं लेंगे , नहीं देंगे । हममे से अधिकांश यही मानते हैं कि रिश्वत नहीं लेना कहना जितना आसान नहीं , नहीं देना उतना आसान नहीं है । कानून कब बनेगा , किस तरह बनेगा , अभी इसके भविष्य पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है , क्योंकि जिस स्टैंडिंग कमेटी में इस पर विचार किया जाना है , उसके सदस्य खुले तौर पर टीम अन्ना की सलाह पर अपनी आपत्ति दर्ज करा चुके हैं । लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से आम आदमी का जुड़ जाना इस टीम या कैम्पेन के लिए के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि है । कम से कम अपने जीवन में आज तक मैंने देशभक्ति के गानों पर झूमते लहराते युवाओं के ये दल स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस के अवसर पर भी नहीं देखे ।
अन्ना ने साबित कर दिया कि यदि स्वच्छ छवि वाले लोंग अपने सुख वैभव का त्याग कर अगुवाई करे तो दिग्भ्रमित युवाओं की विध्वंसकारी गतिविधियों को सही दिशा दी जा सकती है . जो बात सरकार या उनके समर्थक समझाना चाहते हैं कि यह बिल एक दम से भ्रष्टाचार को दूर तो नहीं कर सकेगा , आम जनता भी इस सच्चाई को स्वीकार करती है , मगर हाथ बांधे खड़े मूक दर्शक बने रहने की दौड़ में शामिल होने की तुलना में सकारत्मक दिशा में कुछ कदम चलना कही ज्यादा बेहतर है!
इसलिए लोग अन्ना के साथ चल रहे हैं , दौड़ रहे हैं !

कल जयपुर में भी इस जश्न को मनाने लोंग इकठ्ठा हुए । वाकई यह पहला अवसर था जब ईद , होली या दीवाली के बिना भी पूरा शहर एक साथ जश्न मना रहा था ...

अब मार के दिखा ..!!

अभी अभी बेटी को बस स्टाप तक छोड़ कर आयी हूँ। सुबह के समय चहुँ ओर विद्यालय की और दौड़ती बसें , ऑटो रिक्शा और गणवेश में सुसज्जित विद्यार्थिओं और उनके अभिभावकों की आवाजाही ही नजर आती है। बेटी के बस स्टाप पर ही कई विद्यालयों के बच्चे बस का इंतिजार करते हए आपस में चुहलबाजी करते नजर आ जाते हैं । आज जब वहां पहुंचे तो देखा दो बच्चे आपस में धींगा मस्ती कर रहे थे। देखते ही देखते उनकी मस्ती झगडे में बदल गयी।
दोनों बच्चों में से एक तो अच्छा खासा सेहतमंद गोल मटोल सा था उसका नाम था रोहित , वही दूसरा बच्चा थोड़ा हल्का फुल्का सा रमेश । दोनों में किस बात पर झगडा हुआ ये तो ज्यादा पता नही चला ..मगर शायद कोई पुराना मसला था . रमेश ने रोहित की शिकायत कर दी थे अपने अध्यापक से इसीलिए वह बहुत नाराज़ था। उसने छुटके को धमकाते हुए कहा "देख..अगर अगली बार तुने मेरी शिकायत की तो समझ लेना ..."
रमेश दुबला पतला था तो क्या हुआ ...तैश में आते हुए बोला ..." करूँगा ..बोल क्या कर लेगा."
"देख मेरे भाई ..तुझे इतने प्यार से कह रहा हूँ...तू नही करेगा शिकायत ...समझा।"
"हाँ.. हाँ... समझ गया ...नही...बोल ..तू क्या कर लेगा।"
अब तक तो रोहित को गुस्सा आ गया ..." तू ऐसे नही मानेगा" बोलते हुए दो थप्पड़ जड़ दिए।
रमेश ने उसका हाथ पकड़कर रोकना चाह मगर कामयाब नही हो पाया। गाल सहलाते हुए फिर से बोला ..." देख... अभी तो तुने मुझ पर हाथ उठा दिया ...मैं कुछ नहीकह रहा...मगर अबकी तुने ऐसा किया तो अच्छा नही होगा।"
रोहित का गुस्सा और भड़क उठा...''क्या कहा ..क्या अच्छा नही होगा..."कहते हुए उसने एक चांटा और जड़ दिया।
बेबस सा रमेश थप्पड़ से तो नही बच सका मगर फिर भी बोला " देख मैं तुझे कह रहा हूँ.. मान जा ...अब मत उठाना मुझ पर हाथ..."अब और झगडा बर्दाश्त करने की हिम्मत नही थी। उनका बीच बचाव करते हुए दिमाग में क्या कुछ गूंजने लगा।
क्या हमारे देश की ... नागरिकों की यही हालत नही है... हर आतंकवादी घटना के बाद देश के कर्णधारों का यह बयान ..." आतंकवाद बर्दाश्त नही किया जाएगा ..." वे फिर-फिर कर आते हैं ...चोट पह्नुचाते हैं ...जान माल का नुक्सान होता है....अपने घावों को सहलाते हम फिर से यही नारा सुनते है ..."आतंकवाद बर्दाश्त नही किया जाएगा ...हम मुँहतोड़ जवाब देंगे..." वे फिर आते हैं ...कभी संसद भवन पर ....कभी ताज होटल ...कभी कोई रेल ...कभी कोई बस ....कभी किसी शहर में ....कभी किसी शहर में ....."
बहुत कुछ ऐसा ही चुनाव के दौरान होता है ...बढती महंगाई ...अव्यवस्था ....सामरिक सुरक्षा आदि मसलों पर किसी एक सरकार को संसद के बाहर का रास्ता दिखाने वाले हम ... शिकायत करते हैं उनसे...जो अब हमारी समस्यों पर ध्यान नही दिया तो ....!! जनता जनार्दन को भगवान मानने वाले चुनाव से कुछ वक़्त पहले ही पेट्रोल- डीजल, रसोई गैस , रोजमर्रा की जरुरी चीजों के दाम कर दिए जाते हैं और एक बार बहुमत हासिल करने के बाद ....कौन सी जनता...कहाँ की जनता...और हम फिर से अपने घावों को सहलाते अगले चुनाव के इत्निज़ार में लग जाते है ..."अब चुनाव में जीत कर दिखाना..." .

हम भारत के नौजबां, हालात हमी तो बदलेंगे..........


हम भारत के नौजबां, हालात हमी तो बदलेंगे,
उम्र से लम्बी स्याह काली, रात हमी तो बदलेंगे...........

गाँधी बहुत जरूरी हुए, हर काम को करने की खातिर,
इनके बिना म्रत्यु पत्र भी, मिलता नही समय आखिर,
सच को भी सामने लाने को, जेबें ढीली करने होगी,
जो उनके मेरे मन में है, वो बात हमी तो बदलेंगे.......
हम भारत के नौजबां, हालात हमी तो बदलेंगे..........

सज्जन हमे रास ना आते, गुंडों के तलुवे चाटें,
भूखे को दाना नही, ताकतवर को रबड़ी खिलाते,
"सच का मुंह काला और झूठे का बोलबाला है",
दुनिया ना जो समझे, वो जज्वात हमी तो बदलेंगे........
हम भारत के नौजबां, हालात हमी तो बदलेंगे..........

हर हाथ तोड़ वो डालेंगे, उनको भ्रम बड़ा भारी,
सबको जूते से मसल देंगे, सत्ता के व्यापारी,
देश को जेल बनाने की, निज मन जिनने ठानी है,
उनके भ्रम भरे सारे ख्यालात हमी तो बदलेंगे........
हम भारत के नौजबां, हालात हमी तो बदलेंगे..........

नेता जो संसद में जा, बन बैठे भगवान हमारे,
क़ानून को जो जूती समझे, जनता को बेचारे,
सात पीड़ियों की खातिर, जो देश बेचने को तैयार,
ऐसे गद्दारों की, हर बात हमी तो बदलेंगे........  
हम भारत के नौजबां, हालात हमी तो बदलेंगे..........

Mahatma Gandhi


Mahatma Gandhi became one of the pivotal figures, if not the main figure, in India's history in the Twentieth Century. Along withJinnah and Nehru, Gandhi shaped India's history up to its independence in 1947.
Mahatma Gandhi was born in 1869 and he died in 1948.
Gandhi was born in Porbander in western India. In 1888, he went to London to study law. He returned to Bombay to work as a barrister but went to South Africa to work in 1907. In South Africa, he took part in passive protests against the Transvaal government's treatment of Indian settlers who were in the minority in the region. In 1915, he returned to India and, after joining the Congress movement, he emerged as one of the party's leaders.
Gandhi encouraged Indians to boycott British goods and buy Indian goods instead. This helped to revitalise local economies in India and it also hit home at the British by undermining their economy in the country. Gandhi preached passive resistance, believing that acts of violence against the British only provoked a negative reaction whereas passive resistance provoked the British into doing something which invariably pushed more people into supporting the Indian National Congress movement.
Gandhi was imprisoned in 1922, 1930, 1933 and in 1942. While in prison, he went on hunger strike. His fame was such that his death in prison would make international headlines and greatly embarrass the British at a time when Britain was condemning dictators in Europe.
In 1931, Gandhi came to Britain for the Round Table conferences. Nothing was achieved except for the publicity that Gandhi received for dressing in the clothes of an Indian villager; Gandhi saw this type of dress as perfectly normal for a man who represented the Indian people. The British representatives at the conference were more soberly dressed in formal morning dress.
When in India, Gandhi took on the British where possible. He famous walk to the sea to produce salt was typical of his actions. Britain had a monopoly on salt production in India and Gandhi saw this as wrong. Hence his decision to produce salt by the sea.
He realised that the religious issues of India were too deep for any remedy to work. Hence he collaborated with Mountbatten and Wavell in the build up to independence in 1947. This association with the break-up of India was to cost him his life. There had been one assassination attempt on Gandhi on January 20th 1948 - it had failed. Just ten days later on the 30th January, he was assassinated by a Hindu fanatic who could not forgive Gandhi for his belief that Muslims had equal value to Hindus and no-one was better than anybody else.